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कितना प्रभावी सोशल मीडिया का झुनझुना!

कितना प्रभावी सोशल मीडिया का झुनझुना!

चारों तरफ छाया हुआ है सोशल मीडिया। सोशल मीडिया के काल में या फिर इसके जंजाल में
हर कोई व्यस्त है, मस्त है और सोशल मीडिया के परिवार में चार चांँद लगा रहा है।
इतनी सक्रियता जिंदगी में नहीं होगी, जितनी सक्रियता सोशल मीडिया पर है!
छोटी उम्र के बच्चों से लेकर बड़ी उम्र के बूढ़ों तक सब सोशल मीडिया पर चहल कदमी कर रहे हैं।
सुबह सोशल मीडिया से ,रात सोशल मीडिया से।
सारे जमाने की खबरें,प्रपंच की सारी बारात सोशल मीडिया पर चलती है। हर कोई यहांँ नायक /नायिका हैं । अपनी छोटी सी बात से लेकर बड़ी बातों का पूरा प्रचार- प्रसार तंत्र फैलाया हुआ है। जुकरबर्ग ने जगह दी है तो उस जगह का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। एक मामूली सी बात को फैला- फैला कर विशालकाय बनाने का पूरा यत्न /प्रयत्न हो रहा है।
बंदर के हाथ में जैसे उस्तरा आ गया! हर कोई अपने आप को तीरंदाज समझ रहा है और नए-नए तीर निकाल- निकाल कर यहांँ पेश कर रहा है। मामूली सी बातों की इतनी बड़ी-बड़ी कहानी ! आखिर जगह मिली है तो अपने दिमाग की सारी कलाबाजियांँ वहां दिखा दी जाएँ, भले ही फिर लोग लानत-मलामत भेजें! छोटे-छोटे बच्चे इतने एक्सपर्ट एक्टर्स हो चुके हैं। रील बना -बनाकर एक्टिंग कर रहे हैं बड़ों – बड़ों की! पढ़ाई- बढ़ाई एक तरफ, रील का पैशन- इमोशन एक तरफ। इनफ्लुएंसर तमाम हथकंडे अपना रहे हैं और अशुद्ध लिख -लिख कर, उल्टा सीधा कंटेंट परोस कर , कचरा -कूड़ा बिखेर कर दिमाग में सभी के भर-भर लाइक- कमेंट्स पा रहे हैं। आखिर इन्हें कोई प्रशिक्षण तो मिला नहीं है और न ही कुछ उत्कृष्ट पठन-पाठन या लर्निंग है।

टीनएजर्स अपनी बुद्धि ताक पर रखकर रील पर रील देखे जा रहे हैं। अपना समय / ऊर्जा जाने क्या सीखने में व्यर्थ कर रहे हैं! आखिर स्तरहीनता की पराकाष्ठा देखना हो तो यहांँ देखी जा सकती है आजकल।
सर चढ़कर बोल रहा है यह बुखार। हर कोई सोशल मीडिया का बीमार बना हुआ है। कोई विवेक, तर्क ,बुद्धि यहांँ काम नहीं कर रही सब एक ही धारा में बहे जा रहे हैं। गर्द उड़ रही है और सबको लपेटे ले रही है।

सोशल मीडिया के प्रभाव को और प्रभावी बनाने के लिए बहुत सारे स्क्रीन हीरोज यहांँ उत्पन्न हो चुके हैं ।कई सारे इन्फ्लुएंस है। किस तरह छोटी सी बात को यानी तिल के ताड़ को पहाड़ बनाना है ,इसकी ट्रेनिंग ली जा रही है, दी जा रही है।

सोशल मीडिया कितना प्रभावी है !हकीकत में उसकी कहानी क्या है
यह तो पर्दे के पीछे वाला ही जाने लेकिन प्रपंच और बातों के , दिखावे के परचम लहरा लहरा कर फेक हीरोज बहुत इतरा रहे हैं। जो कमअक्ल हैं,नादान वय में हैं ,अवयस्क है छोटे हैं, मासूम है ,उनको बरगला रहे हैं।
ऐसे-ऐसे श्रेष्ठ विचारों का चौतरफा हमला हो रहा है अच्छे-अच्छे का बेड़ा गर्क को जाए , फिसल जाए, गिर जाए ,भटक जाए ,कुचक्रों में फंँस जाए।
बुनियादी रूप से हिले हुए, आधारहीन लोगों के द्वारा यह जो तंत्र बिछाया गया है उसमें कौन न हिल जाए! सब हिले हुए हैं! सब की धरातल खिसकी हुई है। सब आसमान में टंँगे हुए। समझ ही नहीं आता कि किसे देखें, किसे न देखें । किसे सुने ,किसे न सुनें !क्या पढ़े ,क्या न पढ़ें।
आंँखों पर तो जैसे सोशल मीडिया का एक लुभावना चश्मा चढ़ा हुआ है। उसमें हर तस्वीर रंगीन नज़र आ रही है और मासूम नादान वय के बच्चों, टीनएजर बच्चों का तो बहुत ही अधिक हाल -बेहाल है।
एंड्रॉयड फोन का ही सवाल है । एंड्रॉयड फोन की इन्हें जरूरत ही क्या है! इन्हें साधारण कॉलिंग वाले फोन से ही मतलब होना चाहिए। जब तक ब्रह्मचर्य है, स्कूल है, पढ़ाई है, खेलकूद है ,तब तक इन सब और बातों की क्या जरूरत है इतनी मशक्कत क्यों करना है अभी! लेकिन इन्हें तो कम उम्र में ही सब कुछ जान लेने ,समझ लेने, देख लेने की आवश्यकता पड़ने लगी है!

नादान बच्चों को कौन समझाए कि इस फेक वर्ल्ड में अधिकतर पीतल या कांँच है कोई सोना या हीरा नहीं।
कि उसके पीछे अपनी हीरे जैसी जिंदगी दांँव पर लगा दो। एंड्रॉयड फोन न मिले ,गेम खेलने को न मिले तो जान ही गंवा दो।
इस मुट्ठी में समा जाने वाले छोटे से यंत्र ने पता नहीं कितनों की जिंदगियों को निगल लिया है । आए दिन न्यूज़ चैनल समाचार पत्रों में नादान, मासूम, टीनएजर बच्चों की आत्महत्याओं की खबरें होती है। पता नहीं सरकार इस पर गौर क्यों नहीं फरमाती!! क्या बच्चों के शारीरिक/ मानसिक विकास/ नैतिक विकास के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं!
सोशल मीडिया की स्क्रीन प्रेजेंस कमल की है।
सारी दुनिया स्क्रीन पर ठहर गई है । हकीकत में जैसे कुछ रहा ही नहीं! सच तो यह है कि जिन्होंने यह सब बनाया है उन्होंने अपने बच्चों को इससे दूर रखा हुआ है ।
विदेश में भी काफी घंटे तक मोबाइल से दूर रहने की कोशिश की जा रही है। अन्य गतिविधियों में जीने की कोशिश की जा रही है यानी सही मायनों में वर्चुअल स्क्रीन से बाहर निकल कर व्यावहारिक रूप में खुद को समझ कर, अपनों के साथ, अपनी हॉबीज के साथ,अपने कर्तव्यों के साथ, मित्रों के साथ जीने की कोशिश।

सच तो यह है कि उतना ही प्रभावशाली है सोशल मीडिया, जहाँ हकीकत में सत्य ,न्याय, सर्वहित में आवाज उठा समाज को दिशा दे रहा है । समाज की दशा में गुणोत्तर वृद्धि कर रहा है ,नहीं तो सिर्फ फेक व्यर्थ झुनझुना है जो भीड़ में बज रहा है । नौसिखिया नट की तरह नाच रहा है और लाइक- कॉमेंट्स के लिए ऊल जलूल हरकतें कर रहा है।
इंटरनेट कोरू के खजाने की तरह है और सोशल मीडिया एडिक्शन, जहांँ पर अच्छा- बुरा सब कुछ पक रहा है और आकर्षक में बंँधा हुआ आदमी बिना सोचे- समझे देखे जा रहा है।
यहांँ फेसबुकिया,कापी पेस्ट, कलमकार आत्म मुग्ध,छपास के शिकार है
अयोग्य होते हुए भी अपने आप को प्रचार – प्रसार तंत्र , येन-केन प्रकारेण सम्मान के जंत्र में खपाए दे रहे हैं साहित्यकार। यही बनावटी दिखावटी जंजाल सभी क्षेत्रों में सर्वत्र दिखाई पड़ता है और स्तरहीनता की, अकर्मण्यता की बाढ़ हुई है। मेरी बात फिर वहीं अटक जाती है कि मंच कोई भी हो उसका प्रयोग सार्थक हो, संयमित हो।

अनुपमा अनुश्री

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