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हिंदी साहित्य में भक्ति काल की अवधारणा

“हिंदी साहित्य में भक्ति काल की अवधारणा”
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हिंदी साहित्य जिसे “स्वर्ण युग” भी कहा जाता है यह मध्ययुगीन काल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां भक्ति और आध्यात्मिकता का साहित्य में विशेष रूप से प्रभाव देखने को मिलता है यह 1343 से 1643 ई तक यानी चौदहवीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक का समय माना गया है।
भक्ति का सीधा अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम/ आस्था/ और समर्पण की भावना दिखाई देती है,यही भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएं हैं।
भक्ति काल को दो भागों में विभाजित किया गया नंबर (1. )निर्गुण शाखा
(2. )सगुण शाखा
निर्गुण शाखा में ईश्वर को निराकार रूप में मानने वाले थे, जिसमें कबीर दास जी का नाम सर्वोपरि रूप से लिया जाता है।
और सगुण शाखा में ईश्वर को साकार रूप में सुंदर स्वरूप को मानने वाले एवं चित्रित किया गया है।
निर्गुण के (ज्ञानाश्रयी) कबीर दास जी और
,(प्रेमाश्रयी ) के (सूफी) मलिक मोहम्मद जायसी जी हैं।
1./ निर्गुण में ब्रह्म को ईश्वर के निराकार स्वरूप के उपासना की विधि अपनाई गई है, इसकी ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि कबीर दास जी माने गए हैं, अन्य प्रसिद्ध कवियों में संत रविदास / नानक/ दादू /मलूक दास/ धर्मदास और सुंदर दास जी भी हैं। इन भक्तों ने साधना के सहज मार्ग को अपनाया तथा जाति पाति तीर्थ व्रत आदि का खुलकर विरोध किया है। उनकी रचना में साहित्यिक सौंदर्य चाहे उतना अधिक ना हो किंतु भाव की दृष्टि से वे अत्यंत समृद्ध है। इनकी भाषा पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी है।
निर्गुण शाखा की दूसरी उप शाखा प्रेमाश्रयी के नाम से प्रसिद्ध है इसे पल्वित करने का श्रेय सूफी मुसलमान कवियों को है, इन कवियों ने लोक प्रचलित हिंदू राजकुमारों तथा राजकुमारियों की प्रेम कथाओं को फारसी की “मसनवी शैली” में बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इनकी कविताएं दोहा चौपाई छंदों में लिपिबद्ध की गई हैं। “प्रेम की पीर” विरह वेदना ” की तीव्रता कथा की रोचकता और कल्पना तथा इतिहास का संबंध में इन सूफी कवियों की प्रमुख विशेषताएं हैं। इस शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि मलिक मोहम्मद जायसी जी हैं , जिनका पद्मावत (आख्यान काव्य) हिंदी साहित्य का एक रत्न है।
इसमें लौकिक आख्यान द्वारा पारलौकिक प्रेम की व्यंजना की गई है।
कुतबन कृत–मृगनयनी
मंझन कृत—मधुमालती
कासिम शाह कृत– हंस जवाहिर
तथा नूर मोहम्मद कृत–इंद्रावती अन्य प्रमुख प्रेमाख्यक काव्य हैं।
11वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य भक्ति के क्षेत्र में अवतार- भावना को प्रतिष्ठित कर चुके थे। उन्हीं की शिष्य परंपरा में 15 में शताब्दी में स्वामी रामानंद जी आए, जिन्होंने जनता की चित्त वृत्तियों को समझने का प्रयास किया। इन्होंने जनता के बीच “राम भक्ति” का प्रचार किया। यहीं से सगुणोंपासना पर आधारित “रामाश्रयी शाखा” का शुभारंभ हुआ।
रामानंद जी की शिष्य परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी हुए, जिन्होंने दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम
श्री राम का शक्ति- शील- सौंदर्य का समन्वित रूप “श्री रामचरितमानस महाकाव्य” में प्रस्तुत किया है। राम भक्त की यह पावन मंदाकिनी न जाने कितनों के मन का कल्मष बहा ले गई।
“तुलसीदास जी” द्वारा स्थापित लोक -आदर्श और रामराज की महान कल्पना भारतीय समाज के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक बड़ी देन है।
यह महाकाव्य “अवधी भाषा” में लिखा गया है।

सगुण की दूसरी शाखा कृष्णाश्रयी शाखा कहलाती है, इसके अंतर्गत श्री कृष्ण की पूर्ण ब्राह्म के रूप में प्रतिष्ठा हुई ।”कृष्ण भक्ति के परिवर्तन का श्रेय”बल्लभाचार्य जी” को माना जाता है।वह अपने आराध्य श्री कृष्ण की जन्म भूमि में रहे और इन्होंने गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथजी का एक भव्य मंदिर बनवाया। कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में सूरदास जी को जाना जाता है। जिन्होंने कृष्ण लीला के मधुर पद गाकर प्रेम और संगीत की ऐसी धारा बहाई , जिसमें डुबकी लगाकर जनता का हृदय आनंद मग्न हो गया। सूरदास कृत “सूरसागर” हिंदी साहित्य की “अक्षय निधि” है। “साहित्य लहरी” और “सूरसारावली” भी इन्हीं की रचनाएं हैं। सूरसागर के अंतर्गत सवा लाख पद प्राप्त होते हैं। इनमें विनय /बाल लीला /गोचरण/ गोपी प्रेम/भ्रमरगीत आदि से संबंधित पद पाए जाते हैं।
सूरदास के अतिरिक्त नंददास /परमानंद दास/ कृष्ण दास/ कुंभनदास/ चतुर्भुज दास/ छीत स्वामी तथा गोविंद स्वामी भी है 8 कवियों के इस समुदाय को “अष्टछाप” भी कहते हैं अन्य अनेक कृष्ण भक्त कवियों में “मीराबाई “और “रसखान” विशेष रूप से भी उल्लेखनीय हैं।
ईश्वर में सहज विश्वास, उसकी दीन -वत्सलता/ नाम -स्मरण की महत्ता/ जप/ कीर्तन/ भजन का अवलंबन /गुरु की महत्ता /अहंकार का त्याग /जाति पाति का विरोध/ लोकमंगल की भावना/ सन्त जीवन का आदर्श /सरलता/ परोपकार की भावना/तथा प्रेम महिमा आदि भक्ति काल की सामान्य प्रवृत्तियों के रूप में जाना जाता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कबीर/ जायसी/ सूर/ तुलसी जैसे रस सिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अंतःकरणों से निकलकर देश के कोने में फैली हुई है, जिस कारण भक्ति काल के काव्य में भाव तथा कला पक्ष का उत्कृष्ट रूप मिलता है। इसी कारण इस काल को हिंदी साहित्य का “स्वर्ण युग” भी कहा जाता है।

कवयित्री /लेखिका/ साहित्यकार/ शिक्षिका; अन्नपूर्णा मालवीया (सुभाषिनी) संस्कृत (प्रवक्ता )गौरी पाठशाला इंटर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश।

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