Search for:
  • Home/
  • क्षेत्र/
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि के मेरूदंड थे ओमप्रकाश पवननंदन

सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि के मेरूदंड थे ओमप्रकाश पवननंदन

सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि के मेरूदंड थे ओमप्रकाश पवननंदन

23 मार्च 2025 की सुबह अचानक एक मनहूस खबर हवा में तैरने लगी। सामाजिक/ साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले पवननंदन जी नहीं रहे।यह सुनते ही साहित्य जगत में उदासी की लहर दौड़ गई।खबर आग की तरह फ़ैल गई।जो सुना स्तब्ध रह गया। विगत कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे।पर ऐसे अचानक विदा लेंगे, कोई नहीं जानता था। बेशक शरीर से वो हमारे बीच नहीं हैं पर जब भी बक्सर के साहित्यकारों का जिक्र होगा, इनका नाम अग्रिम पंक्ति में याद किया जाएगा।
पवननंदन जी का जन्म 13 जनवरी 1952 को हुआ था।साहित्यिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि के मेरूदंड थे।अपनी विद्वता,संगठन शक्ति, साहित्यिक, सृजनात्मक प्रतिभा की गहरी धमक केवल बक्सर में ही नहीं,पूरे भारत में जमा चुके थे। मां वागीशा के सच्चे सपूत थे।आखिरी सांस तक सृजन धर्म निभाते रहें।
तकरीबन 57-58 पुस्तकें लिख चुके थे।भोजपुरी एवं हिंदी दोनों साहित्य को समृद्ध करते रहे।अच्छे लेखक होने के साथ बहुत नेक दिल इंसान थे।सादगी, शालीनता, सामाजिकता एवं विनम्रता के जीवन प्रतिमूर्ति थे। उनकी रचनाओं में उनका व्यक्तित्व झलकता है। उनकी रचनाएं उनके जैसी ही सरस, सरल एवं इतनी मार्मस्पर्शी हैं। कोई भी साधारण पढ़ा-लिखा पाठक आसानी से समझ सकता है। वर्तमान में घटित प्रत्येक विषय एवं समस्या पर बहुत सरस एवं ढंग से प्रकाश डालते थे।जीवन संघर्षों से भरा था पर चेहरा कभी मालिन नहीं किए।तेरह मार्च को इनसे मोबाइल से मैं संपर्क की थी।उस वक्त वो बताएं कि बिस्तर से उठ नहीं पाता हूं। खैर कोई बात नहीं। ईश्वर की जो मर्जी?” मुंह पर किसी के लिए कोई शिकायत नहीं था।सच, जुझारू व्यक्तित्व के मालिक थे।
सादगी का प्रतीक सफेद उन्हें खूब भाता था। अक्सर वो सफ़ेद रंग के वस्त्र ही धारण करते थे।अनेक आर्थिक सामाजिक, साहित्यिक, और पारिवारिक झंझावातों के बावजूद सतत् साहित्य सृजन करते रहे।सर्वप्रिय सरस्वती के इस कर्मठ पुत्र को बक्सर की माटी कभी भूल नहीं पाएगी।

डॉ मीरा सिंह “मीरा”

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required