बधाई विदेशी नव वर्ष की
———–बधाई विदेशी नव वर्ष की ————
चौबीस जा रहा है,पच्चीस की अगुवाई।
अपना नहीं, विदेशी नव वर्ष की बधाई।
चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा को,नव वर्ष हमने माना।
फिर वर्ष भर में दो-दो, नव वर्ष क्यों मनाना।
पश्चिम की सभ्यता का जो भूत चढ़ चुका है।
संस्कृति की अहमियत, पूरा निगल चुका है।
जिस सभ्यता को लेकर, होड़ मच चुकी है।
कैसी चली हवा जो अब तक तो ना रुकी है।
खोई हुई विरासत की तो करो भरपाई।
अपना नहीं, विदेशी नव वर्ष की बधाई।
मौसम न खुशनुमा है, सूरज की गर्मी सिमटी।
धरती से ले शिखर तक,चादर सफेद लिपटी।
कलरव रहित है उपवन, जंगल भी बेसुरा है।
बागों से खुशबू गायब, मद के बिना सुरा है।
हैं दूर रंग होली के, मौसम में न गरमाहट।
आ तो नहीं रही है, फसलों की नई आहट।
नव वर्ष जिसे कहते, कितनी है सच्चाई।
अपना नहीं, विदेशी नव वर्ष की बधाई।
जो कुछ भी हो चुका वह सब समय ने देखा।
परिवर्तनों ने दुनिया में खींची है लंबी रेखा।
हम सब गवाह उसके उसे देखे ही जा रहे हैं।
पाने से ज्यादा तो अब, खोते ही जा रहे हैं।
सोच प्रतिस्पर्धा की, परवान जब चढ़ी है।
रिश्तो में बढ़ती दूरी, भी किस कदर बढ़ी है।
हासिल हुआ है क्या, क्या दिया गंवाई।
अपना नहीं, विदेशी नव वर्ष की बधाई।
है कामना ये मेरी, खुशियों भरा हो जीवन।
सुख शांति की वर्षा, वैभव भरा हो आंगन।
अभिमान विरासत पर, न संस्कार भूलें।
सच्चे सनातनी हैं, अंबर को जा के छू लें।
प्यारी धरा हमारी, हम सब हैं इस धरा के।
इतिहास गौरवशाली, गर्वित परंपरा के।
कुछ भी नहीं असंभव सीख हमने पाई।
अपना नहीं, विदेशी नव वर्ष की बधाई।
दिनेश तिवारी
नई दिल्ली