स्वार्थ
स्वार्थ
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हुए प्रबल अब
स्वार्थ के रिश्ते,
टूट रहे हैं
प्यार के डोर।
अंधियारे की
मांग बढ़ी है,
मुरझाया सा
दिखता भोर।
राह ताकती
बाट जोहती,
नही दिखती अब
व्याकुल आंखे।
हृदय कैद से
आजाद होने को,
फड़फड़ा रही हैं
बुलबुल पांखें।
अधिकारों की
जंग छिड़ी है,
भोगवाद का
मचा है शोर।
पापा आज
मूंगफली लाना,
ना लाए गर
तो जान जाना।
बेटी ने
आकर हड़काया,
न लाने पर
मुंह बिचकाया।
आदर प्रेम की
कब्र खुद रही,
विषाक्त हवा पर
नही चलता जोर।
अर्धंगिनी की भी
फरमाईश लटकी,
होगा निश्चित
जोर आजमाइश।
आंख भरा है
जेब है खाली,
कैसे होगी
पूरी ख्वाइश।
दांत पिसती
घूम रही है,
खोज रही
विषवमन का कोर।
रिश्तों मे भी
व्यापार घुसा अब,
सहयोग होता है
लेकर शुल्क।
त्याग बलिदान सब
हुए किताबी,
दशा पर अपने
रो रहा मुल्क।
दहेज के लोभी
वर पक्ष वाले,
बहू से जल्दी
हो जाते बोर।
मित्र सहोदर
मौका ढूंढते,
हर आंखों में
नाच रहा लोभ।
समाज सुधारक
घर में दुबके,
अनैतिकता पर
होता नही क्षोभ।
एक दूजे को
ठेलकर आगे,
बढ़ जाने की
मची है होड़।।
अनिल सिंह “बच्चू”